(एक समसामयिक व्यंग्य)
आज नवमी है। नवरात्रि की नवमी। पूरे मोहल्ले में हलचल मची हुई है। हर गली, हर नुक्कड़, हर दरवाजे पर वही घिसा-पिटा संवाद गूंज रहा है — “बहनजी, कोई छोटी कन्या है क्या? पूजन करवाना है…”
सुबह से ही आंटीगण हाथ में स्टील की थाली लिए घर-घर घूम रहीं हैं। कुछ के पीछे उनके बेटों की टोली है, जो पूरी गंभीरता से ‘दुर्गा-स्वरूप’ कन्याओं की तलाश में जुटी है। जिनके घर कन्या नहीं है, वो परेशान हैं। और जिनके घर कन्याएं हैं, उनके नखरे देखते ही बनते हैं। आठ साल की छुटकी को जैसे ही तीसरी बार नहलाया गया, उसने मां से पूछ ही लिया — “मां, मैं दुर्गा हूं या डोमेस्टिक वर्कर?”
लेकिन छुटकी की मां खुश है। मोहल्ले में उसकी बेटी की आज बहुत डिमांड है। वैसे बाकी 364 दिन जिन लोगों ने उसे ताना मारा था कि “बेटी ही है? बेटा कब होगा?” वे ही आज उसके दरवाजे पर फूल-मिठाई लिए खड़े हैं।
आंटी जी की बगल वाली श्रीमती वर्मा भी आई हैं। कल ही अपने बेटे की शादी के लिए लड़की देखने गई थीं। लौटते ही कह रही थीं — “बस, लड़की पढ़ी-लिखी हो, दहेज भी हो, और बहुत बोलने वाली न हो।” आज वही श्रीमती वर्मा छुटकी के पांव धो रही हैं। बार-बार कह रही हैं — “बिटिया, तुम तो साक्षात दुर्गा हो।”
अब सवाल यह है कि जो कन्याएं आज साक्षात दुर्गा बन चुकी हैं, कल जब वही स्कूल में एडमिशन के लिए जाएंगी, तो यही समाज उन्हें क्यों कहेगा — “लड़की है, ज़्यादा पढ़ा कर क्या करना है?” और जब वही दुर्गा स्वरूप बड़ी होकर कुछ बोलने लगेगी, अपने अधिकार मांगेगी, तो यही समाज उसे क्यों कहेगा — “ज़्यादा बोलती है, संस्कार नहीं हैं।”
क्या अजीब विडंबना है — “कन्या पूजन जरूरी है, लेकिन कन्या का होना जरूरी नहीं है!”
पूजन के बाद मोहल्ले के शर्मा जी अपने मित्र से कहते पाए गए — “अब बस हो गया। एक दिन का पूजन काफी है। वैसे भी बेटी के चक्कर में नहीं पड़ना। आजकल बहुत झंझट है बेटियों का।” फिर जैसे अपराध-बोध से उबरने के लिए फुसफसाए — “मगर हां, आज पूजा में बहुत पुण्य मिला। पांच कन्याएं पांव धुलवाए!”
पूरा मोहल्ला कन्याओं को थाली में हलवा-पूरी परोस रहा है। वहीं पास के सरकारी अस्पताल में एक नन्ही सी बच्ची कल रात कूड़ेदान में मिली थी। ठंडी में लिपटी हुई, कपड़े भी नहीं थे। पूछने पर किसी ने कहा — “किसी ने फेंक दी होगी। शायद लड़की थी…”
अब आप बताइए — किसे पूजना है, और किसे फेंकना है — ये चयन कौन करता है? देवी बनकर पूजी जाने वाली वही कन्या जन्म से पहले कोख में “लिंग परीक्षण” में अस्वीकार क्यों होती है?
हम उस समाज में जी रहे हैं जहाँ कन्याओं की पूजा करने के लिए लोग दर-दर भटकते हैं, लेकिन जब अपनी औलाद के रूप में देवी का अवतार आता है, तो उसका स्वागत नहीं, बल्कि गर्भपात होता है।
क्या नवरात्रि के नाम पर ये एक धार्मिक रस्म है? या दोहरी मानसिकता का उत्सव?
कन्या पूजन एक संस्कार नहीं रहा, बल्कि समाज की “लड़कियां चाहिए, लेकिन सिर्फ पूजा के लिए” वाली मानसिकता का आइना बन गया है।
तो अगली बार जब आप नवमी पर किसी कन्या के पांव धोने जाएं, तो एक बार अपने दिल में झांक कर देखिएगा — क्या आप सच में कन्या को देवी मानते हैं, या बस उसकी ‘उपलब्धता’ का उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि आपके घर खुद ‘कन्या’ नहीं है?
