Friday, January 21, 2022
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UP Election: अगर रैलियों के बगैर हुए यूपी चुनाव तो किसके पक्ष में बहेगी हवा, समझें नफा-नुकसान का सियासी गणित

लखनऊ: ओमिक्रॉन (Omicron) और कोरोना कहर (Corona in UP) की वजह से उत्तर प्रदेश (UP Election) में होने वाले विधानसभा चुनाव (UP Chunav) के तौर-तरीकों में बदलाव हो सकता है.

कांग्रेस और भाजपा ने जिस तरह से वर्चुअल सभा करने का ऐलान किया है, ऐसे में अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग के अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि आयोग रैलियों के बगैर अथवा सीमित करने की स्थिति में चुनाव कराने का फैसला करता है या नहीं. मगर जिस तरह से कोरोना ने रफ्तार पकड़ी है, उसे देखते हुए यह संभव है कि चुनाव आयोग रैलियों पर बैन लगा दे.

ऐसे में अब सवाल उठता है कि अगर रैलियों के बगैर चुनाव हुए तो फिर सियासी तौर पर किसे अधिक फायदा होगा और किसे नुकसान. मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो भाजपा और सपा को इसका अधिक लाभ मिलता दिख रहा है, क्योंकि ये दोनों पार्टियां काफी समय से जनसभाओं से लेकर ताबड़तोड़ रैलियां कर रही हैं और यूपी में माहौल बना रही हैं.

पीएम मोदी,अमित शाह, सीएम योगी से लेकर अखिलेश यादव तक ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं. ठीक इसके उलट बसपा प्रमुख मायावती अब तक रैलियों और जनसभाओं से दूर रहीं. कुल मिलाकर बसपा और कांग्रेस चुनाव नजदीक आने का इंतजार करती रहीं.

अब अगर बगैर रैलियों के चुनाव होते हैं तो फिर भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा समेत सभी पार्टियों को वर्चुअल तरीका ही अपनाना होगा और राजनीतिक इतिहास पर गौर करें तो अब तक वर्चुअल माध्यम में भाजवा सबसे अव्वल साबित हुई है, क्योंकि उसके पास एक बेहतरीन आईटी सेल की टीम है.

भाजपा ने सबसे बड़ी रणनीति को दे दिया है अंजाम

दरअसल, उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर अब तक की तैयारियों पर नजर डालें तो भाजपा और सपा सबसे अधिक जमीन पर दिखाई दे रही है. चुनावी बंदिशें (अगर हुईं तो) होने से पहले ही जन विश्वास यात्रा के रूप में भाजपा ने समय रहते ही अपनी सबसे बड़ी रणनीति को अंजाम दे दिया है.

यूपी के छह क्षेत्रों में भाजपा की जन विश्वास यात्रा लगभग अपने अंतिम दौर में है और 9 जनवरी को समाप्त हो जाएगी. इन जनविश्वास यात्राओं के जरिए अमित शाह से लेकर जेपी नड्डा और तमाम केंद्रीय मंत्री उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए वोट मांग चुके हैं. इस तरह से भाजपा का चुनावी अभियान अन्य पार्टियों के मुकाबले ज्यादा चला है.

हालांकि, अखिलेश यादव भी इस दौरान कम एक्टिव नहीं रहे हैं. अखिलेश यादव भी लगातार रैलियां और रोड शो करते रहे हैं. मगर जिस तरह से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर जमीन स्तर के कार्यकर्ताओं की पूरी फौज अभी यूपी में दिख रही है, उसके मुकाबले सपा, बसपा और कांग्रेस को अभी और मेहनत करने की जरूरत है.

वर्चुअल मोड के लिए आईटी टीम एक्टिव

इतना ही नहीं, रैली और सभाएं अगर सीमित हुईं तो भारतीय जनता पार्टी चुनावी अभियानों में आगे रहने के प्लान पर काम कर रही है. बीजेपी ने सोशल मीडिया के माध्यम से रैलियां करने की योजना बना ली है. इसके लिए यूपी बीजेपी ने इस बार कई आधुनिक तकनीकी से अपने को मजबूत किया है.

जिला ही नहीं बूथ स्तर तक सोशल मीडिया के तीन लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की टीम तैनात कर दी है. बीजेपी आईटी सेल का दावा है कि तीन लाख से ज्यादा प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की टीम तैयार की है. बीजेपी प्रदेश कार्यालय में सोशल मीडिया सेल में वार रूम बन के तैयार हो चुका है.

यही नहीं सभी जिला कार्यालयों में वर्चुअल रैली का सेटअप तैयार हो गया है. यूपी में विधानसभा चुनावों को फतह करने की तैयारियों में जुटी बीजेपी अब डिजिटल रैलियां करने का भी निर्णय ले चुकी है. पार्टी के निर्देश पर यूपी बीजेपी सोशल मीडिया सेल ने डेढ़ लाख लोगों की ई रैली की तैयारियां कर ली हैं.

बसपा-कांग्रेस की चमक रही है फीकी

अबतक उत्तर प्रदेश में जो राजनीतिक हलचल देखने को मिली है, उसके हिसाब से मायावती अब भी रैलियों से बचती रही हैं. यही वजह है कि अमित शाह से लेकर भाजपा के कई नेता चुनावी समर में उतरने को लेकर ललाकर चुके हैं. वहीं, कांग्रेस का चुनावी अभियान भी मिलाजुला ही दिख रहा है.

अबतक प्रियंका के अलावा, सोनिया और राहुल गांधी भी चुनावी समर में नहीं उतर पाए हैं. अगर वर्चुअल मोड में भी ये सभी पार्टियां आती हैं तो भी भाजपा इसमें अव्वल साबित हो सकती है. इसके अलावा, भाजपा के पास न केवल उसके अपना कार्यकर्ता हैं, बल्कि एबीवीपी और आरएसएस के कैडर भी हैं, जो छोटी-छोटी सभाओं के जरिए या फिर घर-घर जाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बना सकते हैं.

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