Lucknow

यूपी में बेलगाम नौकरशाही इसलिए वीआरएस को बना रही है ’हथियार’

अजय कुमार, लखनऊ

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लिए सरकारी कर्मचारियों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम मुसीबत का सबब बनती जा रही है। एक तरफ योगी सरकार कुछ भ्रष्ट और नाकारा अधिकाररियों/कर्मचारियों को वीआरएस के माध्यम से जबरन रिटायर्ड करना चाह रही है,लेकिन यह कर्मचारी/अधिकारी वीआरएस के लिए तैयार नहीं हो रहा, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे सरकारी अधिकारियों/ कर्मचारियों की भी ‘जमात‘ है जिसका सरकारी सेवा से मोह भंग हो रहा है। इस जमात के सरकारी अधिकारियों में बड़ी संख्या ऐसे अफसरों की भी है जो सरकारी सेवा छोड़कर कॉपोरेट सेक्टर से जुड़ने को बेताब नजर आ रहे हैं।

वजह कई हैं। एक तो 2017 में जब से बीजेपी सत्ता पर काबिज हुई है सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों पर काम का दबाव काफी बढ़ गया है,जबकि पहले यह अधिकारी/कर्मचारी किसी भी काम को लटकाने-भटकाने पर ज्यादा ध्यान देते थे। लालफीताशही से जनता ही नहीं, सरकारें तक परेशान हो जाया करती थीं।

उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जो अब इस दुनिया मंे नहीं रहे वह तो ब्यूरोक्रेसी के लिए खुले आम कहते थे कि नौकरशाह एक ‘बेलगाम घोड़े’ जैसे होते हैं, इन पर नकेल वही डाल सकता है जिसकी रानों में जान होगी। वर्ना तो यह घुड़सवार को ही पलट देते हैं। उत्तर प्रदेश में तो कल्याण सिंह की तरह कई मुख्यमंत्रियों को ब्यूरोक्रेसी के सामने घुटने टेके देखा भी जा चुका है,लेकिन जब से दिल्ली में मोदी और यूपी में योगी ने सत्ता संभाली है सरकारी कामकाज का तरीका बिल्कुल बदल गया है। अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक की जवाबदेही तय कर दी गई है।अब कोई अधिकारी/कर्मचारी किसी फाइल को लटका नहीं पाता है।

दरअसल,मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार को अच्छे ढंग से चलाने के लिए लगातार अधिकारियों/कर्मचारियों के पेंच कसते रहते हैं। इसी दबाव के चलते कई अधिकारी/कर्मचारी वीआरएस लेकर सेवामुक्त होने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि अब युवाओं में भी सरकारी नौकरियों को लेकर क्रेज कम होता जा रहा है,कुछ प्रतिशत युवाओं को छोड़ दिया जाए तो अब सरकारी सेवा में वही युवा आने की कोशिश करते हैं जो निजी क्षेत्र में काम करने की या तो काबलियत नहीं रखते हैं या फिर सरकारी नौकरी की चकाचौंध उन्हें इस ओर खिंचती है। वर्ष 2005 से उत्तर प्रदेश की सरकारी नौकरियों में पेंशन खत्म हो जाने की वजह से भी लोगों को सरकारी सेवाओं से मोह भंग होने लगा है।

बहरहाल,बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों के वीआरएस लेने का मुद्दा कभी नहीं उछलता यदि यूपी के कुछ ब्यूरोक्रेट्स वीआरएस के लिए आगे नहीं आते। एक के बाद एक नौकरशाहों के सिविल सेवा की नौकरी छोड़ने की वजह से इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है। भले ही वीआरएस लेने वाले नौकशाह निजी या स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर नौकरी छोड़ रहे हों,परंतु विपक्ष तो यही कह रहा है योगी सरकार नौकरशाहों को परेशान कर रही है,उनसे जबर्दस्ती उलटा-सीधा काम कराया जा रहा है।

बिना वजह प्रताड़ित किया जाता है। पर कुछ ब्यूरोक्रेट्स के नौकरी छोड़ने के असली कारणों को तलाशा जाए तो पता चलता है कि इनके मन में कहीं न कही अपनी सेवाओं को लेकर असंतोष घर कर गया है तो निजी क्षेत्र में बेहतर अवसर मिलने के कारण वह इस असंतोष से जल्द से जल्द पीछा छुड़ा लेने को आतुर नजर आ रहे है। पिछले दो महीनों में यूपी काडर के तीन आईएएस अफसर वीआरएस के लिए आवेदन कर चुके हैं, जबकि दो ने त्यागपत्र भेज दिया है।

ब्येरोक्रेट्स के वीआरएस लेने की वजह से योगी सरकार की भले ही किरकिरी हो रही हो,लेकिन इसकी शुरूआत सपा शासन में हुई थी जब 1993 बैच के आईएएस अधिकारी राजीव अग्रवाल ने सिविल सेवा छोड़कर उबर कंपनी में महत्वपूर्ण पद संभाला था। इसके बाद अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के मन में निजी क्षेत्र का आकर्षण किसी से छिपा नहीं रहा है। 2005 बैच के आईएएस जी. श्रीनिवासुलु के 13 सितंबर 2022 को इस्तीफा देने से इस तरह के मामले और चर्चा में आ गए।

श्रीनिवासुलु का कार्यकाल जुलाई 2030 तक बचा है। उन्होंने अपने इस्तीफे का लिखित कारण स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें बताई हैं, लेकिन उनके काडर के लोग इसे प्रमोशन से जोड़कर देख रहे हैं। दरअसल विशेष सचिव श्रीनिवासुलु के बैच के सभी अधिकारी पदोन्नति पाकर सचिव बन चुके हैं, लेकिन कुछ कारणों के चलते उनकी पदोन्नति नहीं हो सकी।

एक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स ऑफ द रिकार्ड कहते हैं कि 2005 के बाद इस सेवा में भी पेंशन नहीं रह गई है। कई आईएएस अफसर निजी क्षेत्र में यहां से कई गुना पैकेज पर नौकरी पा गए। इसलिए इस नौकरी में एक निश्चित पड़ाव पूरा कर चुके अधिकारियों को निजी क्षेत्र ज्यादा भा रहा है। कुछ अधिकारियों का यह भी कहना है कि देश-प्रदेश की बदली राजनीति में ब्यूरोक्रेसी का अब पहले की तरह रुतबा भी नहीं रह गया है।

अब नौकरशाहों को उसके काम के आधार पर नहीं उसके राजनीतिक संबंध के आधार पर अच्छे पद हासिल हो पाते हैं, जिनके हाथ बेहतर विकल्प लग जाता है, वे आगे बढ़ जाते हैं। बाकी का सरकारी जीवन किसी अनचाही पोस्टिंग और बिना महत्वपूर्ण विभाग में कटता रहता है। साल दर साल सरकारें सिविल सेवकों के अधिकारों में भी कटौती करती जा रही हैं,जिसके चलते ब्यूरोक्रेटस दंत विहीन गजराज की तरह हो गए हैं। सारी पॉवर सरकार ने अपने पास समेट ली हैं।

बात छोटे स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों के वीआरएस लेने कि जाए तो इनका दर्द अपना है। वह कहते हैं अब सरकारी नौकरी में सूखी तनख्वाह से गुजारा करना पड़ता है। पहले सरकारी कमीशन के खेल में सबका हिस्सा बंधा होता था,लेकिन अब बड़े अधिकारी इसे पूरा डकार जाते हैं और अपने नीचे के अधिकारियों/कर्मचारियों से ठेकेदार या किसी प्रोजेक्ट का काम दबाव बनाकर करा लेते हैं।

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