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सहयोगी दलों को सीट देने के पहले भाजपा को संबंधित सीट पर उनके संगठन क्षमता का करना चाहिए आकलन

  • विधानसभा 2017 की अपेक्षा 2022 में बड़ी है चुनौतियां

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी अंतोदय के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए बिना किसी भेदभाव के गरीबों के लिए योजनाओं का शुभारंभ करके आम आदमी के जीवन स्तर को उठाने का बेहतर प्रयास किया है सरकार के इस कार्यक्रम का लाभ ज्यादातर धरातल पर उतरा भी है जिसके कारण आमजन की सरकार के प्रति सकारात्मक सोच है इसके बावजूद भी प्रशासनिक विफलताओं सहित बहुत सी चुनौतियां का सामना बीजेपी को चुनाव में करना होगा।

इसके बावजूद भी मोदी जी की लोकप्रियता और सपा बसपा एक कार्यकाल में हुये भेदभाव का असर भी जमीन पर दिखाई दे रहा है इन सब को ध्यान में रखते हुए अगर बीजेपी ने टिकट वितरण में सावधानी दिखाई तो 2017 के आंकड़ा को आसानी से छू सकती है परंतु इन दिनों स्काई लैब दलबदलू और मौसमी नेताओं का प्यार जिस तरह से बीजेपी के नेताओं के दिल में उतरा है वह कहीं भारी न पड़ जाये।

क्योंकि चापलूस किस्म के व्यक्ति बताते हैं कि 2017 से भी ज्यादा अंडरकरेंट पार्टी के प्रति जनता में दिखाई दे रहा है जिसके कारण अपने कार्यकर्ताओं पर विश्वास ना करते हुए बीजेपी दलबदलूओं को ज्यादा तरजीह दे रही है जिसका जीता जागरण उदाहरण स्वामी प्रसाद मौर्या, दारा सिंह चैहान सहित कई महानुभाव है जो 5 साल सत्ता का सुख भोगने के बाद अब पार्टी को भला बुरा कहते हुये अपने आप को सामाजिक न्याय का मसीहा बता रहे हैं।

अगर इन्हें 2017 में पार्टी ने स्थान न दिया होता तो आज उपरोक्त महानुभाव हाशिए पर होते अवध क्षेत्र के पूर्वी छोर पर स्थित अंबेडकर नगर जनपद का भी यही हाल है 2017 के विधानसभा चुनाव में वहां से बाहरी लोगों को टिकट देकर पार्टी सुनामी में भी हार गई थी आज सभी महानुभाव 5 साल सत्ता का सुख भोगने के बाद दूसरे दलों में भाग गए हैं।

विगत दिनों से जिले में यह चर्चा आम हो गई है कि कटेहरी विधानसभा क्षेत्र निषाद पार्टी को समझौते में जा रही है जबकि हमारे संवाददाता ने कटेहरी विधानसभा सहित पूरे जनपद का सर्वेक्षण किया तो धरातल पर निषाद पार्टी का कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है ऐसे में अगर यह सीट बीजेपी अपने सहयोगी को दे देती है तो वहां पर 2017 में पार्टी को जो 78000 मत मिले थे शायद वह मिल पाना कठिन होगा जिसका लाभ समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को मिलेगा।

इसलिए गठबंधन धर्म का पालन करते हुए बीजेपी को सहयोगी दलों को सीट देते समय वहां पर उनकी जमीनी हकीकत को भी जानने का प्रयास करना होगा सनद रहे 2002 में कटेहरी सहित अंबेडकरनगर की बहुत सी सीटें अपना दल और जनता दल यूनाइटेड को दिया गया था जहां चुनाव में पार्टी 52 से 55000 वोट चुनाव में पढ़ती थी वहां 2200 सौ मतों पर आकर पार्टी सिमट गई। इसी प्रकार अंबेडकर नगर के आसपास की बहुत ही सीटों पर गठबंधन की बात हो रही है अगर समय रहते पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से ना लिया तो यह आत्मघाती कदम सिद्ध हो सकता है।

नाम ना छापने की शर्त पर कई नेताओं ने बताया अंबेडकरनगर में 4 ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पार्टी का होने के बावजूद भी पार्टी की स्थिति पहले से मजबूत होने की वजह है कमजोर हो रही है। जानकारी करने पर पता चलता है की सत्ता का सुख तो महानुभाव प्राप्त कर रहे हैं लेकिन उनकी निष्ठा आएं बीजेपी की जगह कहीं और है जो की जांच का विषय है अब पार्टी नेतृत्व को यह तय करना होगा कि 2017 से सबक लेते हुए अंबेडकरनगर में कार्यकर्ता लड़ आएंगे अथवा सपा बसपा के साथ संबंध निभाने वाले मौसमी और मौका परस्तों पर मेहरबानी जारी रहेगी।

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