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स्त्रियां श्रृंगार क्यों करती है?

सोलह श्रृंगार का धार्मिक एवं वैज्ञानिक आधार (भाग-1)

 स्नेहा दुधरेजीया पोरबंदर गुजरात

हिन्दू महिलाओं के लिए 16 श्रृंगार का बड़ा विशेष महत्व होता है। विवाह के बाद स्त्रियां अनिवार्य रूप से सोलह श्रृंगार करती है। हर एक श्रृंगार का अलग-अलग महत्व होता है। हर स्त्री चाहती है कि, वो सज धज कर सुन्दर लगे,इसलिए श्रृंगार करती है। श्रृंगार और स्त्री एक दूसरे का पूरक है ,बिना श्रृंगार के स्त्री उदास दिखती है जैसे फूल के बिना बाग,बच्चों के बिना घर।
आइए जानते है स्त्री सोलह श्रृंगार क्यों करती है एवं स्त्रीयों का श्रृंगार करना क्यों जरूरी है।

(1)स्त्री का पहला श्रृंगार-बिदियां है ।

संस्कृत भाषा के बिंदु शब्द से बिंदी की उत्पत्ति हुई है। भवों के बीच में बिंदी लगाई जाती है।सिंदूर या कुमकुम से लगाई जाने वाली बिंदी ,भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्रतीक मानी जाता है। सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिंदूर से अपने ललाट पर लाल बिंदी लगाना जरूरी हैं। इसे परिवार समृद्धि बढ़ती है।

बिंदी लगाने के पीछे धार्मिक मान्यता भी है, बिंदी को त्रिनेत्र का प्रतीक माना गया है। दो नेत्रों को सूर्य व चंद्रमा माना गया है, जो वर्तमान व भूतकाल देखते हैं तथा बिंदी त्रिनेत्र के प्रतीक के रूप में भविष्य में आनेवाले संकेतों की ओर इशारा करती है।

विज्ञान के अनुसार, बिंदी लगाने से महिला का आज्ञा चक्र सक्रिय हो जाता है,यह महिला को आध्यात्मिक बने रहने में तथा आध्यात्मिक ऊर्जा को बनाए रखने में सहायक होता है। बिंदी आज्ञा चक्र को संतुलित कर दुल्हन को ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है।

(2) स्त्री का दूसरा श्रृंगार सिंदूर होता है।

उत्तर भारत में लगभग सभी प्रांतों में सिंदूर को स्त्रियां मांग में लगाती है। सिंदूर सुहाग चिन्ह माना जाता है। विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, सौभाग्यवती महिला अपने पति की लंबी उम्र के लिए मांग में सिंदूर भरती है, लाल सिंदूर महिला के सहस्रचक्र को सक्रिय रखता है।यह महिला के मस्तिष्क को एकाग्र कर उसे सही सूझबूझ देता है। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार, सिंदूर महिलाओं के रक्तचाप को नियंत्रित करता है, सिंदूर महिला के शारीरिक तापमान को नियंत्रित कर उसे ठंडक देता है और शांत रखता है।

(3) स्त्री का तीसरा श्रृंगार – काजल

काजल आँखों का श्रृंगार है। इससे आँखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन और उसके परिवार को लोगों की बुरी नजर से भी बचाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, काजल लगाने से स्त्री पर किसी की बुरी नज़र का कुप्रभाव नहीं पड़ता। काजल से आंखों से संबंधित कई रोगों से बचाव होता है।

काजल से भरी आंखें स्त्री के हृदय के प्यार व कोमलता को दर्शाती हैं।
वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार, काजल आंखों को ठंडक देता है। आंखों में काजल लगाने से नुक़सानदायक सूर्य की किरणों व धूल-मिट्टी से आंखों का बचाव होता है।

(4) स्त्री का चौथा श्रृंगार -मेहंदी

मेहंदी के बिना सुहागन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। शादी के वक्त दुल्हन और शादी में शामिल होने वाली परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने हाथों में
मेहंदी रचाती है। ऐसा माना जाता है कि नववधू के हाथों में मेहंदी जितनी गाढ़ी रचती है, उसका पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मेहंदी का गहरा रंग जितना गहरा होता है, पति-पत्नी के बीच के उतना ही गहरा प्रेम से होता है।
वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार मेहंदी दुल्हन को तनाव से दूर रहने में सहायता करती है।मेहंदी की ठंडक और ख़ुशबू दुल्हन को ख़ुश व ऊर्जावान बनाए रखती है।

(5) स्त्री का पांचवां श्रृंगार-शादी का जोड़ा

उत्तर भारत में आम तौर से शादी के वक्त दुल्हन को जरी के काम से सुसज्जित शादी का लाल जोड़ा (घाघरा, चोली और ओढ़नी) पहनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में फेरों के वक्त दुल्हन को पीले और लाल रंग की साड़ी पहनाई जाती है। इसी तरह महाराष्ट्र में हरा रंग शुभ माना जाता है और वहां शादी के वक्त दुल्हन हरे रंग की साड़ी मराठी शैली में बांधती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, लाल रंग शुभ, मंगल व सौभाग्य का प्रतीक है, इसीलिए शुभ कार्यों में लाल रंग का सिंदूर, कुमकुम, शादी का जोड़ा आदि का प्रयोग किया जाता है।विज्ञान के अनुसार, लाल रंग शक्तिशाली व प्रभावशाली है, इसके उपयोग से एकाग्रता बनी रहती है। लाल रंग भावनाओं को नियंत्रित कर स्थिरता भी देता है।

आलेख के दूसरे भाग में स्त्रियों के गजरा, मांग का टीका, नथ, कर्णफूल, मंगलसूत्र,के बारे में धार्मिक वैज्ञानिक महत्व ,और वैज्ञानिक महत्व के बारे में जानेगे।

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