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अयोध्या मुस्कराई-रामलला विराजे-आजादी के बाद भी 76 वर्षो का समय लग गया अयोध्या को खोजने में

  • अयोध्या शापित नहीं बल्कि उसे कुछ रहस्यमयी उन शक्तियों ने जंजीरों में कैद कर दिया था, जो देश के आजाद होने के बाद भी मानसिक रूप से आजाद नहीं हुयें।
  • संतो-निहंगो-साधकों और श्रद्धालुओं ने जिस खोई हुई अयोध्या को निरंतर खोजा आज सामने है। अब सिर्फ उन रहस्यों पर पडे पर्दो को हटाने की आवश्यकता है, जिनके कारण अयोध्या को खोजने में आजादी के बाद भी 76 वर्षो का समय लग गया।
  • अब देश की उन शक्तियों को प्रायश्चित करना चाहिये और उन्हें यह मान लेना चाहिये कि सत्य के वेग को रोके रहना सम्भव नहीं है।
  • श्रीराम के अस्तित्व और उनके अयोध्या के विशेष स्थान पर जन्म लेने का साक्ष्य मांगने वालों को अयोध्या का सच सामने आ जाने के बाद काशी-मथुरा के सच को स्वीकार कर अपने मुॅह पर लगी कालिख को धोने का प्रयास तो कर लेना ही चाहिए, अन्यथा उन्हें इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।
  • कपट भरी राजनीति के कारण ही राममंदिर एवं सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण विलम्वित हुए श्रद्धालुओं को अत्याचार और अपमान सहना पड़ा, देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा ऐसी राजनीति के जीवित रहने से क्या रामराज्य का सपना साकार हो सकेगा? इस पर आमजन को मनन तो करना ही चाहिये।

जिस अयोध्या के बारे में सदियों से यह माना जाता रहा कि वह कभी मुस्करा नहीं सकती, क्योंकि वह श्राप ग्रसित है। आखिर वही अयोध्या आज मुस्करा ही नहीं रहीं है, बल्कि सूर्य के भाॅति दमक रही है। आज अयोध्या की लोकप्रियता भूमण्डल में सबसे आगे है। अयोध्या को श्रापित बनाने एवं बनाये रखने वालें लोगों ने सत्य के वेग को किसी भी तरीके से रोक कर नहीं रखा जा सकता को समझने का प्रयास नहीं किया.

वहीं राम के अस्तित्व को नकारने वालों ने इस तथ्य को समझने का प्रयास नहीं किया कि, ‘‘श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान शिव शंकर भारत राष्ट्र के नहीं ही अपितु समस्त सनातन विचारधारा के लोगों के आराध्य देव हैं। जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता, उन्हें मिटाया नहीं जा सकता, वे थे, वह हैं, वे रहेंगे। इसे प्रान्त भाषा-संप्रदाय एवं राजनीतिक स्वार्थ तथा दलों के दायरे से ऊपर उठ कर देखा जाना चाहिए। राम की जन्म स्थली अयोध्या में 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में रामलला स्थापित हो चुके हैं, मंदिर का निर्माण भी लगभग पूर्ण हो चुका है।

विश्व के अनेकों कोनों से ठिठुरन भरी ठण्ड के रहते भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आवा-जायी हो रही है। आज जो ‘‘असत्य पर सत्य‘ की जीत हुई है, इसे केवल प्रभु राम की कृपा मान कर प्रसन्नता जाहिर करने से काम नहीं चलेगा। प्रभु राम की कृपा हमेशा रही है, रही थी और रहेगी। इसी बीच सभी को इस बात को समझने एवं उस पर मनन करने की एक बड़ी आवश्यकता है कि हमारे आराध्यों की जन्म स्थली पर आक्रांताओं ने कब्जा कर वहाॅ की पहचान को नष्ट कर डाला, जिन्हें हम सैकड़ों वर्ष तक वापस नहीं ले सके अपमान का जहरीला घूंट पीते रहे आखिर क्यों?

इस काले अध्याय का अन्त होने की एक आशा की किरण उस समय सामने आयी थी, जब हमने आजादी पायी भारत गुलामी की जंजीरों से मुक्ति हो गया, स्वदेशी शासन स्थापित हो गया, समय बीतता गया लेकिन एक अर्से तक भारतीय जनमानस की वह अभिलाषा पूर्ण नहीं हो सकी आखिर क्यों? जिसका सपना उसने देश के स्वतंत्र होने के बाद देखा था कि उसके आराध्य देवों की जन्म स्थली पर उसके आराध्य देव विराजेंगे।

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर (गुजरात) का निर्माण प्रशस्त हुआ, लेकिन अयोध्या, मथुरा और काशी के मंदिरों पर जस से तस स्थिति बनी रही, इतिहास साक्षी है कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण पर भी कुछ भारतीय सत्ता के सर्वोच्च पद पर आसीन लोगों ने सेक्युलर शब्द को अपनी भाषा में परिभाषित कर रूकावटे पैदा की.

भला हो स्व0 सरदार पटेल एवं महात्मा गाॅधी का जिनके दबाव के आगे उन रूकावट कर्ताओं की योजनायें सफल नहीं हुई, उनकी असफलता का एक कारण हिन्दू समाज का अनवरत संघर्ष भी रहा, सोमनाथ मंदिर के भाॅति अयोध्या-मथुरा और काशी को लेकर भी हिन्दू समाज का संघर्ष जारी रहा।

अंतर सिर्फ इतना रहा कि भारतीय सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे कथित सेक्युलर वादी शासकों को आक्रांताओं द्वारा इन भारतीय देवों की जन्म स्थलियों का ध्वस्तीकरण और हिन्दू समाज का हो रहा अपमान समझ में नहीं आया या यू कहिये कि उनकी प्राथमिकता में यह सब कुछ था ही नहीं।

डिस्कवरी आॅफ इण्डिया लिखने वाले आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह विदेशी आक्रांताओं के कृत्यों से अनभिज्ञ थे, या जानते नहीं थे। ऐसा कहने से बड़ा कोई और झूंठ नहीं हो सकता क्योंकि उन्होंने ऐतिहासिक अन्यायपूर्ण कृतों का परिमार्जन राजनीतिक रूप से ही किया।

इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद 12 नवम्वर 1947 को जवाहर लाल नेहरू सरकार के केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जूनागढ़ में सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण की घोषणा की राष्ट्र पिता महात्मा गाॅधी ने उनका समर्थन किया जबकि पं0 नेहरू उनकी घोषणा के विरोध में खडे नजर आये, लेकिन गाॅधी जी और पटेल के अडिग रूख के रहते वे मंत्री परिषद की बैठक में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से संबंधित परियोजना और राजकीय वित्त पोषण की स्वीकृत का विरोध नहीं कर सके।

1948 में महात्मा गाॅधी की हत्या एवं दिसम्बर 1950 में पटेल की मृत्यु के बाद पंडित नेहरू का सोमनाथ मंदिर के विरूद्व विरोधी रूख खुलकर सामने आ गया। नेहरू ने सोमनाथ मंदिर निर्माण का दायित्व निर्वाहन कर रहे मंत्री कन्हैया लाल मणिकलाल मुंशी को मंदिर निर्माण एवं ‘‘हिन्दू पुनरूत्थान‘‘ पर कड़ी फटकार लगा डाली.

वहीं तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ जाने से रोकने का अथक प्रयास किया लेकिन वे नहीं रूके, वह गये नेहरू सरकार ने उनके द्वारा दिये गये भाषण के प्रसारण पर रोक लगा दी। यही नहीं पं0 नेहरू ने 1949 की उत्तर प्रदेश सरकार को दिसम्बर 1949 में अयोध्या स्थित विवादित ढांचे परिसर में कुछ साधू-सन्तों ने रामलला की प्रतिमा रख दी, उस प्रतिमा को शीघ्र हटाने का आदेश दिया, जिसे फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के0के0 नायर ने मानने से इन्कार कर दिया।

हिन्दू मंदिरों के प्रति ‘‘नेहरू ने स्वयं 17 मार्च 1959 को ‘‘ललित कला अकादमी ‘‘ के तत्वाधान में भारतीय वास्तु कला पर आयोजित सम्मेलन में अपने भाषण में यह कह कर कि ‘‘कुछ दक्षिण के मंदिरों से………मुझे उनकी सुन्दरता के बावजूद घृणा उत्पन्न होती है। मैं उन्हें बर्दाश्त नहीं कर सकता क्यो? मैं इसे स्पष्ट भी नहीं कर सकता, लेकिन वे मेरी आत्मा को दबाते हैं। सनातनी ईष्ट देवताओं की जन्म स्थली के मंदिरों के प्रति अपनी घृणा को आमजन के सामने रख दिया था।

स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे अधिक दुर्भाग्य पूर्ण घटना महात्मा गाॅधी की हत्या है और वह सनातनी विचारधारा को मानने वाले हिन्दूवादी नेता गोडसे द्वारा की गयी। महात्मा गाॅधी किसी एक विचारधारा पर न चलेकर सभी विचार धाराओं का एक संगम बनाकर भारत को आगे बढ़ाने का इरादा रखते थे, उनके इस इरादे को 1930 में मुस्लिम लीग जो दो राष्ट्र सिद्धान्त जो ‘‘काफिर कुफ्र‘‘ अवधारणा से ग्रसित था, ने इलाहाबाद अधिवेशन में एक पृथक राष्ट्र की माॅग रखकर फिर लगभग तीन वर्षो बाद भारत को खण्डित कर पाकिस्तान का अस्तित्व सामने लाकर कुचल डाला.

इस घटना से गाॅधी काफी व्यथित थे, उन्होने अपनी आॅखों से देखा भी था, कानों से सुना भी था कि भारत केवल खण्डित ही नहीं हुआ है, बल्कि अखण्ड भारत के लगभग 20 लाख लोग कलकत्ता ‘‘डायरेक्ट एक्शन डे‘‘ सहित जगह-जगह हुए भीषण नरसंहार का शिकार हो गये। इसके बाद गाॅधी जी ने एक संकल्प लिया कि भविष्य में इस प्रकार की घटनायें नहीं हो उन्होंने भारत-पाक के बीच में बड़े और छोटे भाई के रिश्तों को बनाने का प्रयास शुरू कर दिया.

उनके इस प्रयास को संभवतः तत्कालीन हिन्दूवादी नेताओं ने नहीं समझा और महात्मा गाॅधी को हिन्दू विरोधी मानकर मार डाला, उनकी यह सबसे बड़ी भूल ही थी। गाॅधी जी का व्यक्तित्व अथवा व्यवहार देख कर यह नहीं का जा सकता कि वह मुस्लिम समर्थक-हिन्दू विरोधी थे। वह स्वतंत्र एवं आदर्शवादी थे। धर्म अथवा किसी एक विचारधारा से वह ग्रसित नहीं थे।

उनके आराध्य श्रीराम थे, वे श्रीराम के आदर्शो को आत्मसात किये हुए थे, वे अखण्ड भारतीय भूखण्ड को रामराज्य की ओर जाते देखना चाहते थे। यही उनका प्रयास था, वह उस राम के भक्त थे जिसके आचरण में मर्यादा थी, राम एक जाति पंथ या मजहब के नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के थे। महात्मा गाॅधी कहते थे कि मैं उस राम को मानता हॅू जो घट-घट वासी हैं, उनका स्वभाव युद्ध करना नहीं बल्कि विवशता है, उनका स्वभाव तो मानवता की रक्षा करना है, जो सबसे बड़ा धर्म है और कर्म है।

इसलिये श्रीराम धर्म की प्रतिमूर्ति हैं, वे भारतीय संस्कृति के आधार हैं, उनका चरित्र भारत का चरित्र है, महात्मा गाॅधी यह चाहते थे कि आजादी के बाद खण्डित होने के बाद भी अखण्ड भारतीय क्षेत्र ही नहीं पूरा विश्व का चरित्र राम ऐसा हो, यही कारण है कि उन्होंने समान रूप से भारत-पाक को अपनी दृष्टि से देखा जो कट्टर वादियों को नहीं भाया।

भारत से लेकर पाकिस्तान और बांग्लादेश जो अखण्ड भारतीय भूखण्ड है, में आजादी के बाद मंदिर-मस्जिद विवाद बरकरार है। कहीं मंदिर ध्वस्त हो रहे हैं तो कहीं मस्जिद-चर्च-गुरूद्वारे -बौद्ध स्थल एवं जैन धार्मिक स्थल, यह सब मानव की कट्टर मानसिकता की ही देन है, जिसे महात्मा गाॅधी समाप्त करना चाहते थे। महात्मा गाॅधी किसी दूसरे की भूमि पर कब्जा कर मंदिर मस्जिद या अन्य पंथ के पूजा स्थलों के निर्माण कराने के विरोधी थे।

उनका स्पष्ट कहना था कि किसी की जमीन पर कब्जा कर अपना पूजा स्थल बनाना एक डकैती के समान है। वह पूजा स्थल कभी भी पवित्र नहीं हो सकता। ऐसे स्थलों को अपने पुराने स्वरूप में लाना ही उचित है। उसके वर्तमान स्वरूप को बदलने के लिये असली हकदार को न्यायालय में जाकर उसे ध्वस्त करा देना चाहिये। वहीं वह यह भी कहते थे कि जब तक सच्चाई सामने न आ जाये तब तक उस पूजा स्थल को जो सामने दिख रहा है की रक्षा करना भी धर्म है।

महात्मा गाॅधी के इन विचारों को कट्टर वादियों ने तो अस्वीकार कर ही दिया था। उनके इन्हीं विचारों के रहते उनकी हत्या कर डाली थी। वहीं गाॅधी वादियों ने भी स्वीकारने की पहल नहीं की गाॅधी वादियों ने तो श्री राम को काल्पनिक ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरा मानना है कि यदि महात्मा गाॅधी कुछ दिनों और जीवित रहते तो कम से कम आजाद भारत में पूजा स्थलों का विवाद जीवित नहीं रहता और ना ही आज मर्यादित राम राजनीति के शिकार होते।

आजादी के बाद भारत राजनीति और धर्म का संगम बन गया, यह वास्तविकता है कि भारत में एक बहुआयामी सामाजिक और धार्मिक राज्य व्यवस्था है। जिसमें अध्यात्मिक पहलू और भौतिकवाद की लालसा है। जिससे भारत का भविष्य हिन्दूवाद एवं मुस्लिमवाद की राजनीति के इर्द-गिर्द घूम रहा है। कल क्या होगा इसके बारे में पहले से कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

आज हिन्दू वाद का बोलवाला है। हिन्दूवादी संगठन एवं सरकारे सेक्युलरजिम यानी धर्म निरपेक्षता की राह पर चलने का दावा करने वाले समाज एवं सरकारों पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाकर उन्हें आमजन से दूर खदेड़ने का प्रयास लगातार कर रही है। यहीं वजह है कि भारतीय समाज में ध्रुवीकरण का दायरा बढ़ता जा रहा है और रामराज्य की कल्पना करना सपना सा प्रतीत हो रहा है। वहीं भारत की धर्म निरपेक्ष नीति जो लोकतंत्र की नीति है वह गुम होती जा रही है। जो एक चिंता का विषय है।

आजादी के बाद भारत में ध्रुवीकरण के दौर का शुरू होना वहीं अयोध्या, मथुरा और काशी में सनातनियों के आराध्य देवों के मंदिर बनने में एक लम्बा समय क्यों लगा को खंगालने की जब पहल की जाती है, तो अनेकों कारणों के साथ एक मुख्य कारण जो सामने आता है, वह है वह भारतीय सत्ताधीश जो धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर चलने का दावा तो करते रहे, लेकिन सत्ता लोलुपता के रहते धर्म निरपेक्षता की आड़ में ध्रुवीकरणच की राजनीति करते रहे।

वह अयोध्या हो काशी हो या फिर मथुरा के विवाद का अंत करने के प्रति गंभीर नहीं हुए, आज जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण पूरा होने जा रहा है, विवादित स्थल पर राम की मूर्ति स्थापित हो चुकी है, इसी बीच उ0प्र0 इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश जस्टिस सुधीर अग्रवाल जो अयोध्या जन्म भूमि मामले की सुनवाई करे रहे थे ने जो खुलासा किया उससे यह प्रतीत होता है कि कुछ रहस्यमय बातों के कारण राम मंदिर निर्माण में जो विलम्व हुआ उसके लिये दोषी कौन है.

उपरोक्त न्यायाधीश के अनुसार तत्कालीन सत्ता के शीर्ष पर बैठी कुछ शक्तियाॅ यह नहीं चाहती थी कि इस मसले पर निर्णय आये, राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की कानूनी लड़ाई न्यायालय में तथ्यों एवं दलीलों के आधार पर चल रही थी। तत्कालीन संप्रग सरकार ने इस मसले पर अदालत में एक शपथ पत्र देकर श्रीराम को कुक काल्पनिक चरित्र बता दिया था.

जस्टिस सुधीर अग्रवाल के अनुसार न्यायालय की तीन सदस्यीय खण्डपीठ ने इस मसले की पूरी सुनवाई कर जब जुलाई 2010 में निर्णय को सुरक्षित रख लिया तब कुछ शक्तियों ने निर्णय न देने का दबाव बनाना शुरू कर दिया ऐसा करने के लिये सरकारी स्तर के अतिरिक्त अन्य स्तरों से भी प्रयास किये जा रहे थे।

Justice सुधीर अग्रवाल के अनुसार निर्णय सुनाये जाने की तिथि से कुछ दिनों पहले उच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने उन्हें अपने चेम्बर में बुलाया और कहा कि भारतीय केन्द्र सरकार यह नहीं चाह रही है कि इस मसले का फैसला सामने आये जस्टिस अग्रवाल के अनुसार अपने वरिष्ठ न्यायाधीश के इस कथन से वह काफी बैचेन एवं आश्चर्यचकित हो गये।

इस खुलासे के साथ उन्होंने यह भी कहा कि, इस मसले की सुनवायी की तीन सदस्यीय खण्ड पीठ के एक अन्य सदस्य जस्टिस एस0यू0 खान ने अपने एक वरिष्ठ न्यायाधीश जिन्हेांने तत्कालीन केन्द्रीय सरकार की इच्छा को इन न्यायाधीशों के सामने रखा था, से सीधे-सीधे कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता और इस मसले पर 30 सितम्वर 2010 को रामजन्म भूमि का ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।

जस्टिस अग्रवाल के इस खुलासे से भारत में ध्रुवीक्ररण और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में हुई देरी के कारण सामने आ गयें, जिन पर विश्वास किया जा सकता है। इसके बाद तथाकथित धर्म निरपेक्षता का दावा करने वालों की दी जा रही किसी भी सफाई पर विश्वास करना एक झूठ को सच साबित करने के समान हो जाता है।

यह प्रमाणित सत्य है कि श्रीराम जी की जन्म भूमि अयोध्या ही है। तमाम रूकावटों एवं अड़चनों के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने तमाम सबूतों के आधार पर यह मानकर कि अयोध्या में विवादित स्थल पर दिख रही बाबरी मस्जिद जिसे 1528 में विदेशी आक्रांता बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने राममंदिर को ध्वस्त कर बनवायी थी। वह स्थल मस्जिद का नहीं बल्कि राम लला का है। इस फैसले के बाद भी हमारे राष्ट्र के कथित सेक्युलर-लिबरल तत्वों के साथ वामपंथी इतिहासकारों ने स्वीकार नहीं किया।

वे लगातार अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को ही नहीं बल्कि हिन्दू समुदाय को भी भ्रमित करते रहे। बाबरी मस्जिद समर्थकों के घाव पर मल्लहम लगाने के बजाये उसे यह याद दिलाते रहे कि विवादित स्थल पर तुम्हारी बनी मस्जिद को कुछ कट्टरवादी हिन्दू नेताओं लालकृष्ण आडवाणी ऐसों ने हिन्दू समुदाय के मुट्ठी भर लोगों को अपने साथ लेकर 6 दिसम्बर 1992 को ध्वस्त कर दिया। जो मुस्लिम समुदाय के लिये एक कलंक है। साथ ही यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि राम की उपासना का सिलसिला तो 18 वीं सदी में शुरू हुआ जो सरासर झूठ हैं।

सम्भवतः ऐसा दावा करने वालों ने, अकबर के दरबारी रहे अबुल फजल जिन्होनंें अकबरनामा एवं आइन-ए-अकबरी लिखी, जिसमें लिखा है कि अयोध्या हिन्दुओं का एक पावन स्थान है, को नहीं पढ़ा या फिर पढ़कर भी उसमें लिखी इबारत को नजरन्दाज कर दिया। अन्ततः अयोध्या विवादित ढांचे का मसला उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद देश की सर्वोच्च अदालत जा पहुॅचा वहाॅ से भी इन विध्वंसकारी लोगों को सफलता नहीं मिली, इसी का परिणाम है कि सदियों से अपमान का घूंट पी रहे रामभक्तों का वह सपना 22 जनवरी 2024 को विलम्व से साकार हो सका जिसकी रामभक्त सदियों से प्रतीक्षा कर रहे थे।

आश्चर्य है इस स्वर्णिम अवसर पर देश के ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में रह रहे सनातनी राममय होकर अपने प्रभु राम की जय-जय कार लगा रहे है। तब भरत के तथा कथित सेक्युलर लिबरल एवं वामपंथी विचारक इसे स्वीकार करने के लिये तैयार नजर नहीं आते वह आज भी आग उगल रहे है, वह 22 जनवरी 2024 को हो चुके आयोजन को राम से जोड़कर धार्मिक आयोजन कहने के बजाये इसे मोदी भाजपा का आयोजन होने का दावा कर रहे है।

उन्हें मनीषियों की मनीषा, तपस्वियों का तप, संगठनों के व्यापक संघर्ष और बृहलर भारत के अन्तःकरण में पीढ़ियों से पोषी गयी शताब्दियों का ताप सहती आस्था जो अब उमड़ती हुई सामने आ गयी है। जिसे भारत समेत प्रायः सम्पूर्ण विश्व रोमांचित होकर देख रहा है। वह नहीं दिख रहा है। वह सिर्फ अपनी हार से क्रोधित मुद्रा में है। वह प्रतिशोध के ताप से झुलस रहे है। उन्हें मानवता की प्रथम राजधानी अयोध्या से मुख्यता के खोयें हुए मान का लौटना समझ में नहीं आ रहा है।

संतो-हिंगों-साधकों और श्रद्धालुओं ने जिस खोई हुई अयोध्या को निरंतर खोजा है, अ बवह सबके सामने है, वहाॅ भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर नजरों के सामने हेै, शायद उन्हें वह रास नहीं आ रहा है। उसकी सुन्दरता उन्हें नहीं भा रही है। उनकी आत्मा भव्य एवं श्रद्धा से परिपूर्ण राममंदिर जिसमें रामलला विराजमान हैं, को देखकर कचोट रहीं है।

वे इस बात को नजरन्दाज ही कर रहे है कि अयोध्या में राममंदिर प्रशस्त होते ही वह एक बड़ा पर्यटन स्थल बन चुका है। इससे देश की आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक स्थित चरम पर पहुॅचेगी विश्व में अयोध्या भारत के मान को बढ़ाने का काम ही कर रही है। जिसका लाभ सभी को एक समान मिलेगा सिर्फ रामभक्तों या फिर मोदी भाजपा को ही नहीं।

आज जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात का श्रेय ले रहे हैं कि उन्होंने केन्द्रीय सत्ता में पीढ़ियों से जमी कुंठा को धो दिया है, और श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन को देश-विदेश के भारतीय समेत संपूर्ण मानवतावादी जगत का महोत्सव बना दिया है। यह अवसर उन्हें किसी और ने नहीं बल्कि उन कथित सेक्युलर-लिबरल एवं वामपंथी इतिहासकारों ने ही दिया है.

जिन्होंने पावर में आने के बाद भी महात्मा गाॅधी एवं सरदार पटेल ऐसे महान लोगों से जिन्होंने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराने का साहस किया उनसे कुछ सीख लेने के बजाये उनके साथ रहकर भी उनके उन कदमों का विरोध किया। जो भारत की पुरानी संस्कृति का पुनरूत्थान के लिये उठाये गये थे।

अयोध्या में रामलला विराजमान हो चुके हैं। सदियों से संजोया गया सपना साकार हो चुका है। अब बाकी है, देश में रामराज्य का होना वह कैसे स्थापित होगा? इस पर सरकारों-राजनीतिक दलों को हीं नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय समाज को साहसिक कदम उठाने होंगे। इसे स्वीकार करने की आवश्यकता भी है कि एक कड़े संघर्ष और बलिदान ने विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता को शुष्क से आद्र की ओर बढ़ा दिया है। जिसे आगे बढ़ाये ही रहना है।

अपनी सभ्यता के बिखरे इतिहास को एक नया जीवन देना है। यह सुखद ही है कि रामलला अपने धाम में लौट आये हैं। जो सभी को शक्ति प्रदान कर रहे हैं, बस अब आवश्यकता है कि घटनाओं के क्रम से आगे बढ़कर तमाम सपनों को साकार करना, राम के भाॅति अत्याचार के संक्रमण का अन्त कर चहूॅ ओर शान्ति और न्याय व्यवस्था को स्थापित कर मानवता की रक्षा करना। यही सबका धर्म और कर्म है।

प्रदीप कुमार पाठक

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